Contact: +91 844 894 1008
bgwebsite_logo
Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 7, Verse 15

न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा: |
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता: || 15||

न–नहीं; माम् मेरी; दुष्कृतिन:-बुरा करने वाले; मूढाः-अज्ञानी; प्रपद्यन्ते–शरण ग्रहण करते हैं; नर-अधमाः-अपनी निकृष्ट प्रवृति के अधीन आलसी लोग; मायया भगवान की प्राकृत शक्ति द्वारा; अपहृत- ज्ञानाः-भ्रमित बुद्धि वाले; आसुरम्-आसुरी; भावम्-प्रकृति वाले; आश्रिताः-शरणागति।

Translation

BG 7.15: चार प्रकार के लोग मेरी शरण ग्रहण नहीं करते-वे जो ज्ञान से वंचित हैं, वे जो अपनी निकृष्ट प्रवृत्ति के कारण मुझे जानने में समर्थ होकर भी आलस्य के कारण मुझे जानने का प्रयास नहीं करते, जिनकी बुद्धि भ्रमित है और जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं।

Commentary

 

श्रीकृष्ण ने उन चार प्रकार के मनुष्यों की श्रेणियाँ बताई हैं जो उनकी शरण ग्रहण नहीं करते।

(1) अज्ञानी मनुष्यः ये लोग आध्यात्मिक ज्ञान से वंचित होते हैं। वे शाश्वत आत्मा के रूप में अपनी पहचान करने और जीवन के लक्ष्य भगवत्प्राप्ति के संबंध में अनभिज्ञ रहते हैं। ज्ञान की कमी उन्हें भगवान के शरणागत होने से रोकती है। 

(2) वे जो आलस्य के कारण निकृष्ट प्रवृत्ति का अनुसरण करते हैं: वे मनुष्य जिनके पास मौलिक आध्यात्मिक ज्ञान होता है और उन्हें यह बोध भी होता है कि उन्हें क्या करना है, किन्तु फिर भी ऐसे मनुष्य अपनी निकृष्ट प्रवृत्ति के कारण भगवान की शरण ग्रहण करने का प्रयास नहीं करते। धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार किसी मनुष्य द्वारा आध्यात्म मार्ग पर अग्रसर न होने में आलस्य को सबसे बड़ा दोषी माना गया है। 

संस्कृत भाषा में इस प्रकार से कहा गया है-

आलस्य ही मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।

नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।।

 "आलस्य एक बड़ा शत्रु है और यह हमारे शरीर में रहता है। कर्म मनुष्य का अच्छा मित्र है जो कभी पतन की ओर नहीं ले जाता।" 

(3) वे जो भ्रमित बुद्धि वाले होते हैं: संसार में ऐसे कई मनुष्य हैं जिन्हें अपनी बुद्धि पर घमंड होता है। यद्यपि वे संतो और धार्मिक ग्रंथो के उपदेशों को सुनते हैं किन्तु श्रद्धा के साथ उन्हें स्वीकार करने की इच्छा नहीं रखते। सभी आध्यात्मिक सत्य तुरन्त सुस्पष्ट नहीं होते। सर्वप्रथम हमें इस सिद्धान्त में विश्वास रखना होगा और फिर इसके लिए अभ्यास आरम्भ करना चाहिए। तब फिर अनुभव द्वारा हम उनके उपदेशों को समझ सकेंगे। ऐसे लोग कोई भी विषय जो उनके लिए वर्तमान में सुस्पष्ट नहीं है, उस पर विश्वास करने से मना कर देते हैं और वे भगवान जो इन्द्रियों की समझ से परे हैं, की शरण ग्रहण करना अस्वीकार कर देते हैं। श्रीकृष्ण ऐसे लोगों को तीसरी श्रेणी में रखते हैं। 

(4) वे जो आसुरी प्रवृत्ति के अधिभूत हैं: ये ऐसे मनुष्य है जो स्वीकार करते हैं कि भगवान है किन्तु संसार में भगवान के प्रयोजन को विफल करने के लिए वे प्रतिकूल, बुरे और अनुचित कार्य करते हैं तथा अपनी आसुरी प्रवृत्ति के कारण वे भगवान के दिव्य व्यक्तित्त्व से घृणा करते हैं। वे किसी को भगवान की महिमा का गान करते हुए या भगवान की भक्ति में लीन होते हुए देखना सहन नहीं कर सकते। स्पष्ट है कि ऐसे लोग भगवान की शरण ग्रहण नहीं करते।

 

Bookmark this Verse

Sign in to save your favorite verses.

Add a Note
Swami Mukundananda
7. ज्ञान विज्ञान योग

Quick Jump to Any Verse

Navigate directly to the wisdom you seek

Book with feather

Stay Connected!

Verse of the Day

Start your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!

Thanks for subscribing to "Bhagavad Gita - Verse of the Day"!